Wednesday, June 27, 2012

AHAK

"अहक"

अनचाहे की एक अहक
होती है ...
जिसके साथ
घर, ज़िंदगी
सिसकी - सिसकी
रहती है...
मनचाहे की
कोई अहक नहीं होती .
आज धुप में एक सकूं है,
पर छाए में एक चुभन है.
आज सूखे मे एक नमी है,
पर बारिश मे धरा बंजर है.
आज शरीर शांत है,
पर आत्मा गतिमान है.
सफ़र अब अच्छा नहीं लगता,
सफ़र में कोई अपना नजर नहीं आता, 
नर्म बिस्तर अब अच्छा नहीं लगता,
नर्म बिस्तर पर कोई सपना नजर नहीं आता,
अब मुझे यही ठहर जाना है,
अब मुझे यही पगडंडी पर सो जाना है.
अब चेहरा भी अपना नजर नहीं आता 
क्यों कोई आइना दिखा नहीं जाता
अब दाग कितने है चेहरे पर नजर नहीं आता
क्यों कोई आइना दिखा नहीं जाता
अब रकीब कोई अपना नजर नहीं आता
क्यों कोई आइना दिखा नहीं जाता
कभी सजाया था जिसने मुझे...
क्यों अब आइना वो नजर नहीं आता,
बचपन एक सुबह है,
जब नीद बहुत आती है..
और बंद आँखों में सपना नजर आता है
जवानी एक धुप है,
जब नीद नहीं आती है
और खुली आँखों में सपना नजर आता है...
बुढ़ापा एक रात है
जब आंखे अधखुली है..
और अधखुली आँखों से सच्चाई नजर आती है//

NAYA PATA

पता तो एक जड़ है ........
पता जिसमे एक बल है ........
पता जिसमें एक पहचान है .......
पता जिसमें एक सम्मान है .........
पते को तो पनप जाना है .........
पते को तो धरती से निकल जाना है .......
अब पते में एक में एक नयी जान है......
अब पते की एक अलग नई पहचान है .......
एक दिन फिर नए पते को फिर जड़ हो जाना है ......
फिर एक नए पते को फिर जन्म देना है.....
क्योकि पता तो एक माँ है.....
पते को तो नए पते को जन्म देना है .....
लोकतंत्र 

पांच बरस में एक मिनट पर इतना हमें गुमान है,
चोर सिपाही न्यायाधीश सबका वोट समान है /
भैस बराबर ठहरे, हमने अर्थ - निति इतनी जानी,
जो दिया घूस या भरी फ़ीस, सबका नोट सामान है/
लोकतंत्र कम भीड़ तंत्र है, शासन इतना आसान है ,
बहुमत मुर्ख बनाते हरदम, परेशान इमान है /
जो धूर्त है वही फूर्त है, अहदी सारे विद्वान हैं , 
पहले राह दिखाता था अब मेरा देश महान है/
गिने जात सिर भीड़ तंत्र में, मस्तिष्क नहीं प्रधान है,
जिसकी लाठी भैंस उसी की, प्रतिभा की कहाँ पहिचान है /
जब से बह पड़ी है प्रजातंत्र की गंगा,
मिला है उनको यह अदिकतम सम्मान है/
राम कॄष्ण शिव शिवा सदा जिसकी रही शान है,
जिसपे बैठे उसीको काटे सिरे चढ़ा शैतान है/
ड्राईवर भी यहाँ का RTO से परेशान है,
फिर भी कहते लोग यहाँ के, मेरा देश महान है/
उस एक मिनट का गुमान भी बस एक मिनट ही रहना है,
घंटे अगले पांच बरस के रहने विगत के ही समान हैं /
लूट सको जितना चाहे लूटो ,
यह लूटतंत्र (लोकतंत्र) की शान है/
जिसको जिम्मेदारी जितनी दी,
वो उतना बईमान है/
सुनो-सुनो अब चौपटराज कुछ दिन का मेहमान है ,
हर सीने से सच्चाई का निकल पड़ा तूफ़ान है/
पांच बरस में एक मिनट पर इतना हमेंगुमान है /
कम से कम पांच बरस में,
एक मिनट को चोर सिपाही नयदिश सब सामान है/
यह ही तो प्रजा तंत्र की शान है,
सच तो यह है की हमको इस पर ही इतना गुमान है/