Tuesday, April 24, 2012


रात
मुझे रात होने का इंतजार है
यह वह रात ही है....
जब मुझे अपने होने का एहसास होता है,
यह वो रात ही है ...
जब चारो तरफ सन्नाटा छाया होता है,
और यह वो सन्नाटा ही है जिसमे मैं अपनी धड़कन सुन सकता हूँ
यह वो रात ही है........
जब चारो तरफ अँधेरा छाया होता है,
और ये अँधेरा ही है जिसमे मैं अपने साये से भी दूर हो सकता हूँ,
यह वो रात ही है.......
जो मुझे सपने दिखाती है,
और ये वो सपने ही है जिसके साथ मैं फिर सबेरे जागना चाहता हूँ,
और ये वो सुबह ही है जिसकी चाह में ही मुझे रात होने का इंतजार है.


Saturday, April 7, 2012

अब भी जलते है दिए उन मुंडेरो पे ....
अब भी रौशनी झाकती है उन रोशंन्दारो से .....
पर अब उन बूढी आँखों में रौशनी नहीं है ..........
वो तो दिए जलाते है की कोई उन्हें रोशंन्दारो से देख सके.....
अब भी बस्तियों के आँगन से धुँआ उड़ता है ......
इस आस में की शायद कोई तो भूखा आएगा ........
आज भी बूढ़े हाथ उस जमीन को सहलाते है ....
जिनको कभी बच्चो ने रोंदा था......
अब धान पीटने की आवाज़ आती वहां से......
पर अब कोई उस रास्ते से गुजरता नहीं........
लोग जो कभी नदियों में छलांग लगाते है ......
अब वो आसमान में उड़ने की कोशिश कर रहे है.......
वो आसमान में उड़ने की कोशिश ही थी....
जो सबकुछ अपने साथ ले गया .....
अब तो कोयल भी उस नीम पर घोसला नहीं बनाती ...........
उसे भी अब नीम का पेड़ नहीं भाता.....
वो जिसकी आँखों में रोशनी नहीं, वह झाकता है खिड़कियो से .....
और जो कभी रहता था यह्ना, वो अब पहचानता नही उन खिड़कियो को....
सच ही सुना है, साजिश रची है किसी ने कभी ....
की अब बस दो मकानों के बिच सन्नाटा और अन्दर पलायन रहता है ....

Mile Stone

मील का पत्थर ...

बचपन में घर के बाहर एक आहट सुनाई दी ....
एक जिज्ञासा उत्पन्न होने लगी .....
मैंने झांक कर देखा तो पक्दंदी नजर आया .....
कुछ लोग उस पक्दंदी पर बाते करते जा रहे थे ...
मुझे भी ये लगा यही तो है जिस पर मुझे चलना है...
में निकल पड़ा एक अनजाने सफ़र पर अनजाने लोगो के साथ ...
पर ना जाने क्यों वो अंजना सफ़र और अनजाने लोग मुझे अच्छे लगने लगे थे ......
एक रिश्ता सा हो गया था ......
अचानक ही एक धूमिल सा पत्थर दीखाई दिया ........
उस पर कुछ लिखा था .........
लोग आनादित हो कर कहने लगे ......
सफ़र का अंत हूआ,
आखिर ये ही तो वो मंजिल थी जिसे हम छूना चाहते थे ......
में स्तब्द सा था,
क्योकि उस पत्थर के आगे तो अब भी सड़क दिखाई दे रही थी ....
जिस पर फिर से मुझे आहट सुनाई दे रही थी .......
मैं फिर निकल पड़ा एक अनजाने सफ़र पर अनजाने लोगो से साथ .......

मुकेश कु. त्रिपाठी.