अब भी जलते है दिए उन मुंडेरो पे ....
अब भी रौशनी झाकती है उन रोशंन्दारो से .....
पर अब उन बूढी आँखों में रौशनी नहीं है ..........
वो तो दिए जलाते है की कोई उन्हें रोशंन्दारो से देख सके.....
अब भी बस्तियों के आँगन से धुँआ उड़ता है ......
इस आस में की शायद कोई तो भूखा आएगा ........
आज भी बूढ़े हाथ उस जमीन को सहलाते है ....
जिनको कभी बच्चो ने रोंदा था......
अब धान पीटने की आवाज़ आती वहां से......
पर अब कोई उस रास्ते से गुजरता नहीं........
लोग जो कभी नदियों में छलांग लगाते है ......
अब वो आसमान में उड़ने की कोशिश कर रहे है.......
वो आसमान में उड़ने की कोशिश ही थी....
जो सबकुछ अपने साथ ले गया .....
अब तो कोयल भी उस नीम पर घोसला नहीं बनाती ...........
उसे भी अब नीम का पेड़ नहीं भाता.....
वो जिसकी आँखों में रोशनी नहीं, वह झाकता है खिड़कियो से .....
और जो कभी रहता था यह्ना, वो अब पहचानता नही उन खिड़कियो को....
सच ही सुना है, साजिश रची है किसी ने कभी ....
की अब बस दो मकानों के बिच सन्नाटा और अन्दर पलायन रहता है ....
Saturday, April 7, 2012
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