मील का पत्थर ...
बचपन में घर के बाहर एक आहट सुनाई दी ....
एक जिज्ञासा उत्पन्न होने लगी .....
मैंने झांक कर देखा तो पक्दंदी नजर आया .....
कुछ लोग उस पक्दंदी पर बाते करते जा रहे थे ...
मुझे भी ये लगा यही तो है जिस पर मुझे चलना है...
में निकल पड़ा एक अनजाने सफ़र पर अनजाने लोगो के साथ ...
पर ना जाने क्यों वो अंजना सफ़र और अनजाने लोग मुझे अच्छे लगने लगे थे ......
एक रिश्ता सा हो गया था ......
अचानक ही एक धूमिल सा पत्थर दीखाई दिया ........
उस पर कुछ लिखा था .........
लोग आनादित हो कर कहने लगे ......
सफ़र का अंत हूआ,
आखिर ये ही तो वो मंजिल थी जिसे हम छूना चाहते थे ......
में स्तब्द सा था,
क्योकि उस पत्थर के आगे तो अब भी सड़क दिखाई दे रही थी ....
जिस पर फिर से मुझे आहट सुनाई दे रही थी .......
मैं फिर निकल पड़ा एक अनजाने सफ़र पर अनजाने लोगो से साथ .......
मुकेश कु. त्रिपाठी.
Saturday, April 7, 2012
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